Wednesday, 22 February 2017

अन्याय के खिलाफ, न्याय की तरफ अग्रसर




कल मुस्लिम स्कालर और उपदेशक  ज़ाकिर साहब के बारे में एक खबर और डिबेट  के ऊपर जब मेने अपनी राय रखी और सुबह जब अपना ट्विटर और फेसबुक अकाउंट ओपन किया तो मेसेजेस की भरमार देखने को मिली। कुछ शुभचिंतको के जिन्होंने मुझे सलाह दी थी की आप अपने विचारो को व्यक्त करते समय थोड़ा सय्यम रखा करिये. अपने बारे में नहीं तो अपने परिवार के बारे में सौच के विचार रखा करिये।  कुछ यंग जनरेशन के मेसेज थे जिसमे उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया था और लिखा था आप सही कर रहे होऔर  कुछ शुभचिंतको की दुआ के मेसेज थेकुछ बेहद भद्दे, अनयंत्रित और बेहूदा मेसेज भी मिले.

कुछ लोगो ने मेरे ट्वीट की कॉपी कर के राजनाथ सिंह, किरण रज्जु, देवेंद्र फडणवीस, को भेज दी और लिखा की इस देश द्रोही को पकड़ो इससे पहले जनता इसके साथ हो जाय.

इस  तरह की धमकियों ओर सरकारी कारिंदों से में कभी भी प्रभावित होने वाला नहीं हूँसच्ची बात कहने, अन्याय के खिलाफ लड़ने और लिखने में मुझे किसी तरहा का  गुरेज़ और डर नहीं और अगर सच्ची बात भारत के खिलाफ हो तो भी में सच्चाई पे गामज़न रहूँगा.   भारत क्या हे, कोई हव्वा नही हे, बल्कि एक ज़मीन का टुकड़ा हे जिसकी हैसियत अंतरिक्ष से या हवाई यात्रा से देखने पे एक समान दिखती हेभारत का मेरे नज़दीक महात्व सिर्फ के ज़मीन के टूकड़े का हेलेकिन महात्व हे वहां पे रह रहे मनुषयो का वहां के समाज  का, वहां की न्याय प्रणाली का, वहां की सरकार का, सरकारी नुमाइंदो का, सरकारी यंत्र काजिसके खिलाफ बोल भी सकते हे और लिख भी सकते हेअगर भारत में समाज हे इंसान हे तो गलती होना भी स्वाभाविक हेक्योकि गलती इंसान से होती हे ईश्वर या उसके फरिश्तो से नहीं होती।  और अगर गलती होगी तो सवाल भी उठना स्वाभाविक हेक्या न्याय की कुर्सी पे बैठने वाले या क़ानून बनाने वाले अपना सीना ठौक के कह सकते हे के उन्होंने अपने जीवन में कभी भी अन्याय का साथ नहीं दिया।  या कभी भी एक बेगुनाह को सज़ा नही दी ये जानते हूए भी के वो बेगुनाह हे.

मेरा ये मानना हे के जिन लोगो को हम चुन के सासद या विधान सभा तक पहूँचाते हे और अगर वो लोग अपने कर्तव्य का पालन न्याय पूर्ण नहीं करते तो उनके खीलाफ लिखना और उनको अपनी गलती का एहसास दिलाना हर शहरी का कर्तव्य  हेऔर अगर एक इसान बेगुनाह हे और उसके साथ नाइंसाफी  हो रही हे तो वो क्या करेमुम्बई पुलिस की रिपोर्ट के आधार पे नदीम को गुलशन कुमार के खून का मुख्य आरोपी माना गया था. फिर लन्दन उच्च न्यायलय ने कैसे ये मान लिया की जो सुबूत पेश किये गए वो नदीम को दोषी मानने के लिए काफी नहीं हे.  हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने फिर लन्दन हाई कोर्ट  की रूलिंग को कैसे सही करार दिया.

न्याय के लिए जद्दो जेहद करना और अन्याय के खिलाफ लड़ना एक इबादत हेशहीद याकूब मेमन को फ़ासी  दी जाती हे जबकि बाबरी मस्जिद को शहीद करने वाले दोषी सांसद में बैठे हेउच्चतम न्यायलय का निर्देश होता की मस्जिद की यथास्थिति बनी रहना चाहिएउसपे इन भाजपा के तमाम दोषियो ने उच्चतम न्यायलय में हलफनामा दिया के हम मस्जिद को नूकसान नहीं होने देगे और यथास्थिति कायम रखेगेहमको मस्जिद के बाहर मैदान में भजन पूजन करने की आज्ञा दी जाय. फिर किया हूआ अवमानना की इन लोगो ने उच्चतम न्यायलय कीतो में उन लोगो से सवाल करता हूँ जो मेरे को देश द्रोही कहते हे के सही में देश द्रोही कोन हे जो कानून की अवमानना कर रहा हे उच्चतम न्यायलय के आदेश की धज्जिया उड़ा रहा हे या जो न्याय के लिए लड़ रहा हे.

में कुछ सवाल जनता के सामने रखना चाहता हूँ अगर एक मनुष्य को भारत की न्यायपालिका से न्याय नहीं मिलता अगरचे वो बेगुनाह हे  तो वो क्या करे. दूसरी बात अगर एक अप्रवासी भारतीय विदेश में रहता हे और भारत की सरकार उसके ऊपर गेर ज़रूरी इलज़ाम लगा कर उसको जेल में डालने की फिराक में हे और उसको सलाह देना की आप अपनी न्याय पालिका में अपील कीजिये क्या गलत हे. एक बेगुनाह को अपने आप को साबित नहीं करना चाहिए।  गलती प्रशासन से प्रशाकीय लोगो से हो सकती हेअगर गलती नही होती तो नदीम सैफी के खीलाफ तो मुम्बई पुलिस के पास ठौस सुबूत थे तो उन सुबूतो की धज्जिया लन्दन उच्च न्यायलय के सामने उड़ते हूए सबने देखि।  इसी तरह भारत सरकार के पास उरई और पठानकोट हमले में पाक के हाथ होने के पख्ता सबूत थे फिर अमेरिकी प्रशासन ने इन हमलो को आतंकवादी हमला और क्रॉस बॉर्डर टेरर लिस्ट में क्यों नहीं रखा.

अगर यही सारे प्रश्न में सरकार से या सरकारी नुमाइंदो से पूछता हूँ तो गद्दार हो जाता हूँअगर देश भक्ति का पैमाना हर ज़ुल्म को चुप चाप सहेना और मू से कूछ कहना और अगर सच्चाई की पैरवी करना सच्ची बात कहना गद्दारी हे तो में अपने पाको सबसे बड़ा गद्दार मानने को तैयार हूँ.
जुबेर अहमद खान
पत्रकार

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